लीची

क्या लीची खाने की वज़ह से बच्चे हो रहे है बीमार? जानें इस अफ़वाह के पीछे का सच

क्या लीची खाने की वज़ह से बच्चे हो रहे है बीमार? सोशल मीडिया यूजर्स व कुछ प्रतिष्ठित न्यूज़ वितरित करने वाले समूह जिस तरह से अफवाह फैलाने वाले किसी गिरोह की भाँति काम कर रहे है, वो शायद अब तक किसी ने नहीं किया होगा।

ऐसे कृत्य मीडिया व सोशल मीडिया यूजर्स के आये दिन सामने आते ही रहते है लेकिन जिस तरीके से मासूम बच्चों की मौत पर सरकार से सवाल करने की जगह सीजन के एक फल को दोषी ठहरा दिया गया वो वाकई शर्मनाक कृत्य है।

सबसे पहले यह जान लेते है कि आखिर पूरा मामला क्या है?

दरअसल बिहार में इस वक़्त चमकी बुखार या कहे जापानी बुखार और अगर मेडिकल भाषा में कहे तो एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम (एईएस) का प्रकोप चल रहा है। जिसकी वजह से अब तक करीब 150 बच्चे काल के गाल में समा चुके है।

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इस बीमारी के चपेट में सबसे ज्यादा बिहार के मुजफ्फरपुर के बच्चे आये है। इतनी बड़ी त्रासदी पर मीडिया तथा सरकार को जाहिर है, मौतों का कारण पता लगाना चाहिए।

जानकारी के लिए बता दें कि बिहार में काफी बड़े पैमाने पर लीची के बाग़ है जहाँ से पूरे देश में लीची सप्लाई की जाती है। देश की करीब 70% से अधिक लीची का उत्पादन अकेले बिहार राज्य में ही किया जाता है।

लेकिन मामला एकदम उल्टा हुआ, जहाँ सरकार ने मामले की जांच कर अपना पल्ला झाड़ा, तो वहीं मीडिया तथा सोशल मीडिया यूजर्स के एक ख़ास समूह ने सरकार की लचर व्यवस्थाओं की पोल खोलने की जगह एक लीची नाम के फल को दोष देना शुरू कर दिया, जिसके लिए तरह – तरह के पोस्ट्स तथा वीडियो शेयर कर वायरल कर दिया गया।

किसी नतीजे पर पहुँचने से पहले या किसी को दोष देने से पहले, यह पता लगाना जरूरी है कि क्या बच्चे लीची खाने की वजह से बीमार पड़ रहे है और उनकी मौतें हो रही है। इसके लिए हमें सरकार और अन्य संस्थाओं द्वारा जारी की गई मामले पर रिपोर्ट और मेडिकल एक्सपर्ट्स की राय जाननी होगी।

क्या कहती है स्वास्थ्य मंत्रालय की रिपोर्ट?

इंडिया टुडे स्वास्थ्य के मुताबिक़ स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा अब तक तीन प्रेस रिलीज़ की गई है। इन प्रेस रिलीज़ में अभी तक ऐसा कहीं नहीं बताया गया है कि बच्चे लीची खाने की वजह से चमकी बुखार की चपेट में आ रहे है।

सरकार द्वारा 18 जून, 2019 को जारी प्रेस रिलीज़ में भी बच्चों की मौत को लेकर कोई ठोस वजह नहीं बताई है, जिससे किसी नतीज़े पर पहुँच कर सही दिशा में काम किया जा सके और बच्चों की मौत को रोका जा सके। अब तक सरकार ने अपनी प्रेस रिलीज़ में सिर्फ आंकड़े जारी किये है, जिसमें बच्चों की बुखार से मौत का प्रतिशत, गर्मियों में चलने वाली लू और मरने वाले बच्चों के पोषण प्रोफाइल के प्रतिशत को बताया गया है।

मेडिकल एक्सपर्ट्स की राय

अब तक कई बाल रोग विशेषज्ञ इस बात का खंडन कर चुके है कि लीची खाने से बच्चे चमकी की बुखार की चपेट में आ रहे है। प्रख्यात शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ संजीव बगई और बिहार के श्रीकृष्ण मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल के विभागाध्यक्ष डॉ गोपाल शंकर का कहना है कि बच्चे लीची खाने की वजह से बीमार पड़ नहीं पड़ रहे है, बल्कि बदलते मौसम, पर्यावरणीय कारक जैसे कि गर्मी की लहर, और क्षेत्र में खराब वर्षा के होने की वजह से पड़ रहे है।

कैसे बनी लीची खाने से बच्चों के बीमार होने की थ्योरी

साल 2017 में भारत तथा यूएस के वैज्ञानिकों ने बिहार में चमकी बुखार के कारणों का अध्ययन किया था, जिसकी रिपोर्ट साल 2017 में अंतरराष्ट्रीय चिकित्सा पत्रिका “द लांसेट” में प्रकाशित हुई। रिपोर्ट में बताया गया कि कच्ची लीची में प्राकृतिक रूप से हाइपोग्लाइसिन ए एवं मिथाइल साइक्लोप्रोपाइल ग्लाइसिन टॉक्सिन काफी मात्रा में पाया जाता है।

ये टॉक्सिन शरीर में बीटा ऑक्सीडेशन को रोक देते हैं, जिससे रक्त में ग्लूकोज़ की कमी हो जाती है और फैटी एसिड्स की मात्रा बढ़ जाती है। जैसे कि बच्चों के लिवर में ग्लूकोज स्टोरेज कम होता है, जिसकी वजह से पर्याप्त मात्रा में ग्लूकोज रक्त के द्वारा मस्तिष्क तक नहीं पहुंच पाता और मस्तिष्क गंभीर रूप से प्रभावित हो जाता है। जो चमकी बुखार का कारण बनता है।

क्यों नहीं किया जा सकता लीची की थ्योरी पर विश्वास

साल 2017 में ही “द अमेरिकन जर्नल ऑफ ट्रॉपिकल मेडिसिन एंड हाइजीन” (एएसटीएमएच) में प्रकाशित एईएस पर बांग्लादेश और अमेरिकी वैज्ञानिकों के एक अन्य संयुक्त शोध ने “द लैंसेट” में प्रकाशित अध्ययन का खंडन कर दिया था। रिपोर्ट में निष्कर्ष निकला कि बीमारी की वजह लीची नहीं है। बल्कि वो कीटनाशक दवाएं है जो प्रयोग की जाती है।

बिहार के श्रीकृष्ण मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल विभागाध्यक्ष डॉ गोपाल शंकर जो पिछले कई साल से ऐसे मामलों को देख रहे है उन्होंने भी लीची के सेवन से चमकी बुखार के होने का कारण को नहीं बताया है। न्यूज़ 18 के मुताबिक़ उनका कहना है कि बच्चों की मौत “आकस्मिक विफलता” के कारण हुईं और इसके बजाय “पर्यावरणीय कारक” जैसे कि गर्मी की लहर और क्षेत्र में खराब वर्षा का होना। पहले लोग सोचते थे कि यह प्रकोप एक वायरस के कारण होता है।

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लेकिन यह हीट स्ट्रोक का मामला है जो इन मौतों का कारण बनता है। 2005, 2011, 2013, 2014 और 2019 के वर्षों में, जब तापमान और आर्द्रता क्रमशः 38 डिग्री सेल्सियस और 50 प्रतिशत से अधिक दर्ज किए गए थे। तो हालात और ज्यादा बद्तर हो गए थे।

डॉ शंकर ने आगे कहा कि उत्तर भारत के अन्य हिस्सों में तापमान और आर्द्रता में उतार-चढ़ाव होता है और रातें ठंडी होती हैं, लेकिन मुजफ्फरपुर में, रात में आर्द्रता बढ़ जाती है, जिससे यह दिन के मुकाबले खराब हो जाती है, खासकर बच्चों के लिए।

उन्होंने कहा कि इस प्रकोप के लिए बारिश ही एकमात्र उपाय है। जब कुछ दिन पहले बारिश हुई, तो अगले दिन अस्पताल में एईएस रोगियों की संख्या में गिरावट देखी गई। अब जब बारिश नहीं हुई है, तो संख्या बढ़ रही है।

इन तथ्यों के आधार पर कहा जा सकता है कि लीची खाने से बच्चों के बीमार होने खबरें ज़्यादातर अफ़वाह के अलावा कुछ नहीं है। अगर ऐसा कुछ होता तो सरकार इसके लिए पहले ही निर्देश जारी कर देती।

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