वैदिक सभ्यता

क्या वैदिक सभ्यता की वजह से हम उल्टा इतिहास पढ़ रहे है

वैदिक सभ्यता: भारत के इतिहास को लेकर देश के इतिहासकार समय – समय पर नये दावे करते ही रहते है। जिसमें से कुछ दावे सही मिलते है और कुछ दावे समझ से ऊपर ही निकल जाते है। इतिहास में वैदिक सभ्यता को भारत की पहली सभ्यता बताना, कुछ ऐसा ही दावा है जो समझ से परे है।

भाषा वैज्ञानिक व इतिहासकार डॉ राजेंद्र प्रसाद कुछ ऐसे ही बिंदुओं को लेकर भारत में इतिहास की बह रही उल्टी को लेकर सवाल उठा रहे है। वो लिखते है कि – कैसा इतिहास – बोध है कि सिंधु घाटी की सभ्यता के बाद वैदिक युग आया? कहाँ सिंधु घाटी की सभ्यता का नगरीय जीवन और कहाँ वैदिक युग का ग्रामीण जीवन ! भला कोई सभ्यता नगरीय जीवन से ग्रामीण जीवन की ओर चलती है क्या ?

सिंधु घाटी के बड़े – बड़े नगरों के आलीशान भवनों की जगह कैसे पूरे उत्तरी भारत के वैदिक युग में अचानक नरकूलों की झोंपड़ी उग आईं? तुर्रा यह कि ये नरकूलों की झोंपड़ियाँ उसी पश्चिमोत्तर भारत में उगीं, जहाँ बड़े -बड़े सिंधु साम्राज्य के भवन थे। आपको ऐसा इतिहास – बोध उलटा नहीं लगता है?

आप पढ़ाते हैं कि सिंधु घाटी की सभ्यता में लेखन – कला विकसित थी और फिर उसके बाद की वैदिक संस्कृति में पढ़ाने लगते हैं कि वैदिक युग में लेखन – कला का विकास नहीं हुआ था। वैदिक युग में लोग मौखिक याद करते थे और लिखते नहीं थे। ऐसा भी होता है क्या ? पढ़ी – लिखी सभ्यता अचानक अनपढ़ हो जाती है क्या?

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आप यह भी पढ़ाते हैं कि सिंधु घाटी की सभ्यता में मूर्ति – कला थी। फिर उसके बाद पढ़ाते हैं कि वैदिक युग में मूर्ति – कला नहीं थी। क्या यह सब उलटा नहीं है ?

भारत में स्तूप – स्थापत्य, लेखन – कला, मूर्ति – कला आदि का विकास निरंतर हुआ है। कोई गैप नहीं है। यदि इतिहास में ऐसा गैप आपको दिखाई पड़ रहा है तो वह वैदिक संस्कृति को भारतीय इतिहास में ऐडजस्ट करने के कारण दिखाई पड़ रहा है।

स्तूपों का इतिहास, लेखन -कला का इतिहास, मूर्ति-कला का इतिहास सभी कुछ सिंधु घाटी सभ्यता से निरंतर मौर्य काल और आगे तक जाता है। बशर्ते कि आप मान लीजिए कि सिंधु साम्राज्य से लेकर मौर्य साम्राज्य और आगे तक टूटती – जुड़ती बौद्ध सभ्यता की कड़ियाँ थीं।

नगरों की खुदाई में कई चरण, लेयर, स्टेप मिलते हैं। मगर वैदिक सभ्यता का कोई चरण, लेयर, स्टेप नहीं मिलता है। इसलिए यह कहना कि सिंधु घाटी सभ्यता के बाद और उसके ऊपर वैदिक सभ्यता का आक्रमण हुआ या विकास हुआ या उसका लेयर मिला, गलत है।

आर्य भारत के भीतरी भागों में आक्रमणकारी के रूप में नहीं बल्कि विशेषकर नौकरशाह के रूप में आए थे।

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Rajendra Prasad Singh

वीर कुंवर सिंह यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर व भाषा वैज्ञानिक, हिंदी साहित्य व प्राचीन भारतीय इतिहास के विशेष जानकार
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