असम एनआरसी

क्या है असम एनआरसी और क्यों इस पर मच रहा है बवाल?

आज 30 जुलाई 2018 को पूर्वोत्तर राज्य असम एनआरसी (राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर) का अंतिम ड्राफ्ट जारी कर दिया गया। खबरों के मुताबिक इस ड्राफ्ट की लिस्ट में 40 लाख लोगों के नाम गायब है। राजनीति इस वक़्त एनआरसी मुद्दे पर चरम पर है।

आरोप – प्रत्यारोप का दौर शुरू हो चुका है। वहीं सरकार द्वारा जारी असम एनआरसी ड्राफ्ट में जिन लोगों के नाम लिस्ट में नहीं है उनके लिए यह वक़्त बड़ा ही असमंजस से भरा हुआ है क्योंकि भारत में रहने से संबंधित उनका भविष्य इस लिस्ट पर ही टिका हुआ है।

क्या है असम एनआरसी?

साल 1971 में बांग्लादेश के स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान काफी बड़ी संख्या में लोग पलायन करके असम में बस गए थे। असम के स्थानीय लोगों और पलायन करके आये लोगों के बीच नौक – झोंक शुरू हो गई।

इसी नौक – झोंक ने बाद खूनी संघर्ष का रूप ले लिया, जिसका नतीजा यह हुआ कि स्थानीय लोगों और संघठनो ने अवैध रूप से रह रहे बांग्लादेशियों को वापस भेजने की मांग शुरू कर दी।

जिसका फायदा राजनीतिक पार्टियों ने भी खूब उठाया और इसे चुनावी मुद्दा बनाने लगे। साल 1979 में ऑल असम स्टूडेंट यूनियन और असम गण परिषद ने अवैध रूप से रह रहे बांग्लादेशियों को वापस भेजने के लिए आंदोलन की शुरुआत की। इस आंदोलन ने खूनी संघर्ष का रूप लिया और हजारों लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा।

साल 1985 में केंद्र की सत्ता में मौजूद कांग्रेस तथा देश के तत्कालीन प्रधानमन्त्री राजीव गाँधी ने ऑल असम स्टूडेंट यूनियन और असम गण परिषद से मुलाकात की। इस मुलाकात में तय किया गया कि 1951-71 के पलायन करके आये लोगों को भारत की नागरिकता दी जायेगी तथा बाकि लोगों को वापस बांग्लादेश भेज दिया जायेगा।

लेकिन राजीव गाँधी की यह मुलाकात असफल रही और एक बार फिर आंदोलनकारियों और पलायन करके आये लोगों के बीच संघर्ष शुरू हुआ। साल 2005 में राज्य सरकार और केंद्र सरकार में इस मुद्दे को लेकर बात बनीं और समझौते के तहत एनआरसी लिस्ट अपडेट करने का फैसला लिया और मामला सुप्रीमकोर्ट पहुंचा।

बीजेपी ने खेला दांव

साल 2014 में बीजेपी ने पलायन करके आये लोगों के मुद्दे को चुनावी मुद्दा बनाकर खूब भुनाया। साल 2015 में एनआरसी लिस्ट अपडेट करने के लिए सुप्रीमकोर्ट का फैसला आया। जिसका फायदा बीजेपी को भरपूर मिला और इसका नतीजा यह हुआ कि साल 2016 में बीजेपी ने असम में अपनी सरकार बनाई।

पिछले 3 सालों में राज्य के 3.29 लोगों ने अपनी नागरकता साबित करने के लिए करीब 6.5 करोड़ दस्तावेज भेजे। इन दस्तावेजों में 14 प्रकार के प्रमाणपत्र शामिल थे जो ये साबित कर सके कि उनका परिवार साल 1971 से पहले असम राज्य का मूलनिवासी है। राज्य सरकार के कर्मचारियों ने घर – घर जाकर रिकॉर्ड चेक किये और वंशावली को आधार बनाया।

असम में भी बीजेपी ने खेला हिंदू कार्ड

बीजेपी जिस राज्य में जाये और वहां हिंदू कार्ड न खेले ऐसा शायद ही मुमकिन हो। बीजेपी ने यहाँ अवैध रुप से रह रहे हिंदू बांग्लादेशियों को नागरिकता देने की बात कही थी। बांग्लादेश से आये घुसपैठिये हिंदू तथा मुस्लिम दोनों ही है।

ये भी पढ़े – ट्राई के चेयरमैन ने आधार नंबर ट्वीट कर दिया चैलेंज तो हैकर ने जानकारियाँ की सार्वजानिक

इसलिए अगर धर्म को आधार बनाकर नागरिकता प्रदान की गई तो वहां रह रहे हिंदू तथा मुस्लिमों के बीच खाई और बढ़ जायेगी जो किसी राज्य की शांति के लिए शुभ संकेत तो नहीं हो सकते।

NS Team

News Scams is a online community which provide authentic news content to its users.

अपनी राय दें

avatar
3000
  Subscribe  
Notify of