क्या है राफेल डील और सरकार की क्यों हो रही है खिंचाई?

राफेल डील
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क्या है राफेल डील?

मौजूदा बीजेपी सरकार और कांग्रेस में राफेल डील को लेकर रार जल्द ही थमने वाली नहीं लगती क्योंकि सरकार इस मामले पर लगातार विपक्ष को गुमराह कर रही है। राफेल डील साल 2007 से शुरू हुई थी।

साल 2007 में यूपीए सरकार (कांग्रेस) फ्रांस को 126 विमानों के लिए 54,000 करोड़ रूपये चुका रही थी। लेकिन मामला विमानों की गुणवत्ता को लेकर अटक गया। वहीं मौजूदा बीजेपी सरकार 36 विमानों के लिए 58,000 करोड़ रुपये चुका रही है।

हालाँकि सरकार दावा कर रही है कि विमानों के अलावा अन्य उपकरण भी साथ में है। वहीं सरकार इस पूरी डील के खर्चे को बताने से भी मना कर रही है। डील के खर्चे तथा उपकरणों को बताने से मना करने के पीछे सरकार दोनों देशों के बीच हुए गोपनीय समझौते का हवाला दे रही है।

दूसरी तरफ डिसॉल्ट एविएशन ने अपनी 2016-17 की वार्षिक रिपोर्ट में बताया है कि उसने 1,670 करोड़ रुपये प्रति एयरक्राफ्ट की दर से 36 एयरक्राफ्ट बेचे हैं। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी का कहना है कि उन्होंने फ्रांस के राष्ट्रपति से जब इस गोपनीय समझौते के बारे में पूछा तो उन्होंने साफ़ मना कर दिया और कहा कि ऐसा कोई गोपनय समझौता नहीं हुआ है।

जबकि रक्षामंत्री निर्मला सीतारमण लगातार कह रही है कि वो राफेल डील का ब्यौरा नहीं दे सकती क्योंकि दोनों देशों के गोपनीय समझौता हुआ है।

कैसे शुरू हुई राफेल डील?

भारत अपने आस – पास के कई दुश्मन देशों से घिरा हुआ है जो लगातार चुनौतियाँ देते रहते है। इसलिए भारत ने अपनी वायुसेना को मजबूत करने का निर्णय लिया। खबरों के मुताबिक़ पूर्व पीएम अटल बिहारी बाजपेयी ने 126 लड़ाकू विमान खरीदने का प्रस्ताव रखा था।

जिसकी पहल कांग्रेस सरकार में साल 2007 से शुरू हुई। उस वक़्त रक्षा मंत्री ए.के. एंटनी ने 126 विमानों की खरीद के लिए हरी झंडी दे दी और बिडिंग के बाद आरएफपी जारी कर दिया गया।

एनडीटीवी की खबर के मुताबिक़ उस वक़्त लड़ाकू विमानों की रेस में अमेरिका के बोइंग एफ/ए-18ई/एफ सुपर हॉरनेट, फ्रांस का डसॉल्‍ट राफेल, ब्रिटेन का यूरोफाइटर, अमेरिका का लॉकहीड मार्टिन एफ-16 फाल्‍कन, रूस का मिखोयान मिग-35 और स्वीडन के साब जैस 39 ग्रिपेन जैसे एयरक्राफ्ट शामिल थे।

जिसमें से राफेल ने बाज़ी मारी। साल 2012 से लेकर 2014 तक विमानों की गुणवत्ता तथा तकनीक के ट्रांसफर को लेकर लम्बी बातचीत चली लेकिन कोई नतीजा नहीं निकल सका।

क्योंकि 126 विमानों में से 18 उड़ने लायक मिलने थे तथा बाकि विमान भारत में तकनीक ट्रांसफर के तहत बनाए जाने थे लेकिन
डसाल्ट एविएशन भारत में बनने वाले विमानों की गुणवत्ता की जिम्मेदारी लेने को तैयार नहीं था।

क्या हुआ राफेल डील का साल 2014 में मोदी सरकार आने के बाद

साल 2014 में बीजेपी सत्ता में आयी और साल 2015 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी फ्रांस गए। पीएम ने फ्रांस की यात्रा के दौरान राफेल डील पर समझौता किया। इस समझौते के तहत भारत को 36 राफेल विमानों के लिए 58,000 करोड़ रुपये होंगे।

मतलब जिस एक विमान का दाम 428 करोड़ रुपये था अब उसके लिए सरकार 1,670 करोड़ रुपये चुका रही है।

राफेल डील में रिलायंस की भूमिका

जैसा कि राफेल डील में कुछ विमान उड़ने लायक तथा बाकि विमान भारत में निर्मित होने थे तो भारत में इन विमानों को निर्मित करने के लिए भारत की सरकारी कंपनी हिंदुस्तान एयरक्राफ्ट लिमिटेड को भूमिका सीधे तौर पर निभानी ही थी।

लेकिन मोदी सरकार ने सार्वजनिक कंपनी हिंदुस्तान एयरक्राफ्ट को किनारे कर एक अनाड़ी कंपनी ‘रिलायंस डिफेंस लिमिटेड’ जिसे इस काम का कोई अनुभव नहीं था उसे डिफेंस ऑफसेट कांट्रैक्ट दे दिया गया।

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जिसके लिए सारे नियम कानून दांव पर रख दिए। इसलिए सरकार राफेल डील की कीमत और रिलायंस की भूमिका पर चारों ओर से घिर गई है।

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