दीपावली

दीपावली के बाद अब किसको जिम्मेदार ठहराया जायेगा इस दम घोटूं हवा के लिए?

देश में बढ़ते हुए वायु प्रदूषण के स्तर को नियंत्रित करने के लिए सुप्रीमकोर्ट ने 23 अक्टूबर 2018 एक आदेश दिया, कि दीपावली त्यौहार के दिन, रात 8 से 10 बजे के बीच ही पटाखे फोड़े जाये और उसके बाद पटाखे न फोड़े जायें। सुप्रीमकोर्ट का यह आदेश बीजेपी तथा हिंदुत्व के कुछ ठेकेदारों को नागवार गुजरा।

इन ठेकेदारों ने वायु प्रदूषण के मुद्दे को अलग रख सुप्रीमकोर्ट को हिन्दू विरोधी ही करार दे दिया। मध्यप्रदेश के उज्जैन से भाजपा सांसद चिंतामणि मालवीय, जिनको सांसद होने के नाते सुप्रीमकोर्ट के आदेश का सम्मान करना चाहिए था। लेकिन चिंतामणि ने सम्मान के बजाय यह कहा कि वो तो दीपावली के दिन रात 10 बजे के बाद ही पटाखे फोड़ेंगे अब चाहे इसके लिए उन्हें जेल ही क्यों न जाना पड़े।

वहीं दिल्ली से बीजेपी के प्रवक्ता तेजिंदर पाल सिंह बग्गा, तो दीपावली के दिन रात 10 बजे के बाद पटाखे फोड़ने वालों को बधाई देते हुए नजर आये। साथ ही उन्होंने लिखा कि कुछ फर्जी झोलाछाप एक्टिविस्टों को उनकी औकात दिखा दी। खैर यह तो ठहरे राजनेता जिनका काम ही ऐसे मुद्दों पर राजनीति करना होता है।

जिन्हे देश के हित से कोई मतलब बमुश्किल ही होता है और देश में मुसीबत के समय, या कहे तो प्राकृतिक आपदा के समय, आराम से एक जगह से दूसरी जगह आसानी से पलायन भी कर सकते है। लेकिन उन आम लोगों के लिए क्या कहा जाये? जिनके लिए प्राकृतिक आपदा के समय एक जगह से दूसरी जगह पलायन करना नामुमकिन है।

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लेकिन इन तथाकथित देश भक्त नेताओं के शब्द आकाशवाणी की तरह लगते है और उनका पालन करना वो अपना धर्म समझते है। ऐसे लोग जिनका खुद का दिमाग ही नहीं चलता, क्या वो सभी लोग प्राकृतिक आपदा के समय इन कथित देशभक्त नेताओं से मदद पा सकेंगे? या बीते समय में ऐसे कितने लोगों ने मदद पाई। बेशक जवाब न ही होगा।

बीते साल देश के कई हिस्सों ने अब तक प्राकृतिक आपदाओं का सामना किया है और ये प्राकृतिक आपदाएं कहीं न कहीं हम सभी से ही जुडी है। अगर साफ़ शब्दों में कहा जाये तो इन ज्यादातर आपदाओं के हम सभी ही जिम्मेदार है। अभी हाल ही में देश के कई हिस्सों ने भयंकर बाढ़ का सामना किया।

क्या इन देशभक्त नेताओं की देशभक्ति जागी? क्या इन नेताओं और धर्म के ठेकेदारों ने व्यक्तिगत रूप से कोई मदद की? इन सवालों के जवाब का आप खुद ही पता लगायें या इन धर्म के ठेकेदारों और नेताओं से जवाब मांगे। उसके बाद ही सुप्रीमकोर्ट के आदेश को जन विरोधी या धर्म विरोधी की नजर से देखें।

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