योगी सरकार के पास जानवरो के मरने का रिकॉर्ड मौजूद लेकिन सीवर सफाई में मारे गए मजदूरों का नहीं

योगी
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21 वीं सदी में नर्क जैसा जीवन जीने पर मजबूर सीवर सफाई कर्मचारी, जो जाहिर है एक ही समाज से आते है, उन्हें अब योगी सरकार द्वारा भी उपेक्षित कहा जा सकता है। यूपी सरकार से आरटीआई के द्वारा माँगा गया जवाब कि प्रदेश में साल 2017-18 के दौरान सीवर सफाई करते वक़्त कितने मजदूरों की मौत हुई है जिसके जवाब में योगी सरकार ने बताया कि इसकी जानकारी प्रदेश सरकार को नहीं है।

मीडिया विजिल पर प्रकाशित लेख के मुताबिक यूपी सरकार से असंगठित क्षेत्र में काम कर रहे कुल मजदूरों से संबंधित जानकारी मांगी गई थी। साथ ही सरकार से 2017-18 के दौरान सीवर सफाई करते वक़्त मारे गए मजदूरों की की जानकारी भी मांगी गई थी। जिसके जवाब में राज्य सरकार बताती है कि किसी विशिष्ट सर्वेक्षण के अभाव में राज्य में कुल असंगठित क्षेत्रों के मजदूरों की संख्या बता पाना मुश्किल है।

वहीं साल 2017-18 में सीवर सफाई के दौरान कितने मजदूरों की मौत तथा कितनों को मुवाबजा दिया गया के सवाल पर जवाब मिलता है कि राज्य सरकार का श्रम विभाग इस तरह से सीधे आंकड़े एकत्र नहीं करता है। सवाल यह है कि जिस सरकार के पास असंगठित क्षेत्रों के कुल मजदूरों का आंकड़ा ही नहीं है तो उन मजदूरों के लिए सरकार किस तरीके से कल्याणकारी नीतियां तैयार करेगी? जबकि असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले करीब 40 लाख ((अकेले यूपी में ही) मजदूरों की स्थिति दयनीय है।

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वहीं सीवर सफाई से जुड़े काम के मजदूरों की हालत बद से बद्तर हो चुकी है। जो सरकार स्वच्छ भारत अभियान के ऊपर करोड़ों खर्च करती है उस स्वच्छ भारत की योजना को सफल बनाने वाले सीवर सफाई मजदूर सरकार की उपेक्षा के शिकार है। जिनकों अपनी मौत पर सरकार की तरफ से उचित मुआवजा तक भी नहीं नसीब होता।

वहीं मीडिया तथा नेताओं की टोली का एक हिस्सा जो गायों तथा अन्य जानवरों की मौत पर देश में हाय – तौबा मचाता है, वो आखिर सीवर सफाई के काम में मर रहे मजदूरों की मौत पर कुछ क्यों नहीं बोलता? क्या सीवर सफाई के मजदूरों की जान की कीमत इन जानवरों से सस्ती है या ये सरकार की नजर में दया के पात्र ही नहीं है?

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