संसद का पास एससी-एसटी एक्ट

संसद का पास एससी-एसटी एक्ट अब न्यायालय के आगे पंगु

संसद का पास एससी-एसटी एक्ट: बचपन से लेकर अब तक आपने किताबों में यही पढ़ा होगा कि कानून बनाने का काम संसद का है और उसका पालन कराना, प्रसाशन और न्यायालय का है। अगर संसद से पारित, कोई इन कानूनों का पालन न करे तो न्यायालय उस व्यक्ति को, उस कानून के तहत उच्च दंड देता है।

सोचिये, उस वक़्त स्थिति क्या होगी जब संसद के पारित कानूनों का उपचार ढूंढा जाए और उन उपचारों के माध्यम से न्यायालय अपने फैसले सुनाये। कुछ ऐसा ही हाल, अभी हाल ही में संसद में पास हुए एससी – एसटी एक्ट का हुआ है। जिसका नमूना उत्तरप्रदेश के उच्च न्यायालय ने दिया।

मामले को समझने के लिए सबसे पहले यह जानना जरूरी है कि एससी – एसटी एक्ट के तहत क्या सजा का प्रावधान है? अगर प्रसाशन इन धाराओं में अगर मुकदमा दर्ज करे तो किस तरह कार्यवाही करेगा।

क्या है एससी-एसटी एक्ट?

एससी – एसटी एक्ट मामले में अगर कोई व्यक्ति दोषी पाया जाता है तो दोषी को 6 महीने से लेकर 5 साल तक की सजा तथा जुर्माने तक का प्रावधान है। इसके अलावा क्रूरतापूर्ण मामलों में मृत्यु दंड तक का प्रावधान है।

मामले में अगर कोई सरकारी कर्मचारी या अधिकारी, जो एससी तथा एसटी समूह का सदस्य नहीं है और मामले में जानबूझकर लापरवाही करता है, तो उस सरकारी कर्मचारी को भी इस एक्ट के तहत 6 माह से एक साल तक की सजा दी जा सकती है।

अनुसूचित जाति या जनजाति का पीड़ित व्यक्ति अगर इस मामले के तहत अगर आरोप लगाता है तो मामला दर्ज करना होगा तथा आरोपी की तुरंत गिरफ्तारी होगी। आरोपी मामले में अग्रिम जमानत का भी हकदार नहीं होगा।

हालांकि आरोपी को हाईकोर्ट से नियमित जमानत मिल सकती है। मामले की जांच इंस्पेक्टर रैंक के पुलिस अफसर करेंगे। जातिसूचक शब्दों के इस्तेमाल संबंधी शिकायत पर तुरंत मामला दर्ज करना होगा।

इसके अलावा एससी/एसटी मामलों की सुनवाई सिर्फ स्पेशल कोर्ट ही करेंगे। साल 1989 में मौजूदा कांग्रेस सरकार ने यह कानून देश में दलितों और आदिवासियों पर बढ़ते हुए अत्याचार को कम करने के लिए संसद से पास कराया था।

न्यायलय के सामने कैसे पंगु बना संसद का पास एससी-एसटी एक्ट

उत्तरप्रदेश के लखनऊ में स्थित हाईकोर्ट की खंडपीठ ने इसका अच्छा खासा उदाहरण पेश किया है। एससी-एसटी एक्ट के तहत दर्ज मामले के खिलाफ हाई कोर्ट में याचिका दायर की गई।

जिस पर जस्टिस अजय लांबा और जस्टिस संजय हरकौली ने आरोपी की गिरफ्तार को लेकर फैसला दिया। पीठ ने फैसले में कहा कि 7 साल से कम सजा वाले अपराध में गिरफ्तारी की जरूरत नहीं है।

पीठ ने साल 2014 में सुप्रीम कोर्ट के अरनेश बनाम बिहार मामले का अनुसरण करते हुए फैसला दिया। मतलब संसद के पारित कानून को सुप्रीम कोर्ट के पूर्ववत फैसलों के आधार पर पंगु बनाया जा सकता है।

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सनद रहे कि एससी – एसटी एक्ट मामले में दोषी को 6 माह से 5 साल तक की सजा व जुर्माने तक का प्रावधान है। वहीं एससी – एसटी एक्ट अभी हाल ही में सुप्रीमकोर्ट के फैसले को रद्द करते हुए पास किया गया था।

अगर मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का अनुसरण ही करना था तो संसद में एससी – एसटी एक्ट को पास कराने का क्या मतलब रहा? अगर सारे फैसले हाईकोर्ट, सुप्रीम कोर्ट के पूर्ववत फैसलों पर ही करता है तो संसद में अब नए कानूनों की जरूरत ही क्या होगी?

बिजनेस स्टैण्डर्ड से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार सत्येंद्र पीएस ने मामले पर सोशल मीडिया पर लिखा कि

इसका मतलब यह कि आप किसी दलित को घर मे घुसकर पीटें। तब तक पीटें जब तक मर न जाए। अगर मर गया, तब तो गिरफ्तारी हो जाएगी। अगर नहीं मरा तो थानेदार साहब मानेंगे ही नहीं कि दलित की पिटाई हुई है और वो कहासुनी का मामूली मुकदमा दर्ज कर लेंगे जिसमें गिरफ्तारी की जरूरत नहीं है।

NS Team

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