सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश की कहानी किसी महाड्रामा से कम थोड़े ही है

सबरीमाला मंदिर
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केरल के सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर जिस तरह से मीडिया न्यूज़ चैनलों और सोशल मीडिया पर महाड्रामा देखने को मिला था, वो महज लोगों का मनोरंजन करने के अलावा कुछ नहीं था। आपको शायद यह बात अटपटी लगे लेकिन यही एक कड़वा सच है।

अगर आपको इस मामले के बारे में पता न हो तो पहले जान लें कि सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने इससे सम्बंधित मामले पर सुनवाई करते हुए फैसला दिया था कि मंदिर में महिलाओं का प्रवेश जायज है। वहीं मंदिर प्रशासन का नियम है कि मंदिर में 10 से लेकर 50 वर्ष तक की महिलायें मंदिर में प्रवेश नहीं कर सकती।

सुप्रीमकोर्ट के फैसले के बाद रेहाना फातिमा जैसी कुछ कथित सामाजिक कार्यकर्ता पुलिस सुरक्षा में मंदिर के अंदर जाने का प्रयास करती है, पूरे देश में ऐसा लग रहा था कि मंदिर में बैठे पंडितों की रूढ़िवादी परम्पराओं को तोड़कर ये महिलायें एक नया इतिहास रच देंगी लेकिन महज 10 सीढ़ियों की दूरी से ये महान कथित सामाजिक क्रांतिकारी महिलायें वापस लौट जाती है और रूढ़िवादी परम्परायें एक बार फिर जीत जाती है।

वहीं सोशल मीडिया पर भी महिलाओं के प्रवेश को लेकर ट्रेंड चलायें जाते है। आखिर इस सब झमेले के बाद हासिल क्या हुआ। सब पहले से ही जानते थे कि मंदिर में बैठे पुजारी पंडितों के नियम के आगे देश का संविधान, सुप्रीमकोर्ट और यहां तक की संसद भी लाचार है। इसको समझने के लिए अभी कुछ समय पूर्व राष्ट्रपति के साथ जगन्नाथ पुरी मंदिर में पुजारी – पंडितों द्वारा गर्भ गृह में प्रवेश को लेकर की गई धक्का – मुक्की काफी है।

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जो राष्ट्रपति देश की तीनों सेनाओं का अध्यक्ष होता है, जिसे देश का सर्वोच्च तथा प्रथम नागरिक माना जाता है, वो व्यक्ति मंदिर में बैठे पुजारी – पंडितों के हाथों से अपने परिवार सहित धक्के खाकर बाहर आ जाता है तो ये मामूली से कथित सामाजिक कार्यकर्ता क्या हैसियत रखते है। गौर करने वाली बात यह है कि उस वक़्त मीडिया इस मुद्दे को लेकर कोई बहस नहीं करवाता है।

मीडिया का व्यवहार ऐसा लगा था, मानों देश का राष्ट्रपति न होकर पाकिस्तान का राष्ट्रपति हो। जिसने नीच जाति का होकर राष्ट्रपति के पद के जोश में हिन्दू रीति – रिवाजों को तोड़कर मंदिर में घुसने की कोशिश की। वहीं राष्ट्रपति कार्यालय पत्र लिखकर बड़े बेवसी के अंदाज में विरोध जताता है। अब इस सब के बावजूद सबरीमाला मंदिर में महिलाओं का प्रवेश किसी महाड्रामा से कम न लगे तो क्या लगे।

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