रामानंद कबीर के गुरु

क्या रामानंद कबीर के गुरु थे? जानें इस सवाल का सही जवाब

बचपन से हम अब तक किताबों में यही पढ़ते आये है कि रामानंद कबीर के गुरु थे। लेकिन कबीर के साहित्य जब पढ़ा जाता है तो रामानंद का कहीं जिक्र भी नहीं मिलता है। अब भला कोई अपने गुरु का नाम अपने पूरे साहित्य क्यों नहीं लेना चाहेगा। खैर भारत का इतिहास और साहित्य जातिवादि मानसिकता से भरा पड़ा है।

तो मुमकिन है कि कबीर भी उसके शिकार हो गये हो। सोशल मीडिया पर चर्चित भाषा वैज्ञानिक और इतिहासकार डॉ राजेंद्र प्रसाद इस बारे में लिखते है कि “कबीर ने कहीं नहीं …कभी नहीं कहा है कि मेरे गुरू रामानंद हैं। तो फिर सबसे पहले कौन कहा कि कबीर के गुरू रामानंद थे?

जो सबूत उपलब्ध है, उसके अनुसार सबसे पहले व्यास जी ने कहा कि कबीर के गुरू रामानंद थे। व्यास जी ने क्या कहा? –

” साँचे साधु जु रामानंद….जाको सेवक कबीर धीर अति”।

अर्थात रामानंद सच्चे साधु थे और उनके सेवक अति धीर कबीर थे।

व्यास जी कौन थे?— व्यास जी का असली नाम हरीराम शुक्ल बताया गया है, ओरछा के थे। व्यास जी ने कबीर को रामानंद का चेला होने की बात उनकी मृत्यु के कोई 100 साल बाद बताई। व्यास जी अब झूठ बोले या सच, कबीर तो मरने के बाद व्यास जी से कहने आएंगे नहीं कि मैं रामानंद का चेला नहीं हूँ।

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व्यास जी के बाद न सिर्फ कबीर को बल्कि पीपा जी, सेन, रैदास और धन्ना को भी रामानंद का चेला बताए जाने की परंपरा चल पड़ी।

मगर इन पाँचों में से किसी ने भी रामानंद को अपना गुरू नहीं बताया। उल्टे पीपा जी और धन्ना ने कबीर से अपने को प्रभावित बताया।

पीपा जी ने कबीर की प्रशंसा में लिखा—

” जो कलि माँझ कबीर न होते। तौ ले बेद अरु कलियुग मिलि करि भगति रसातलि देते “।।

अर्थात यदि कलियुग में कबीर नहीं होते तो वेद और कलियुग मिलकर भक्ति को रसातल में पहुँचा देते।
और कविता के अंत में पीपा जी ने कबीर के प्रति श्रद्धा जताते हुए लिखा है कि कबीर से मैंने बहुत कुछ पाया है।

तो बहुत कुछ बातें न सिर्फ झूठी हैं बल्कि उल्टी भी हैं।

Rajendra Prasad Singh
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